22 अप्रैल | सम्पूर्णानन्द मिश्र | हिंदी कविता

22 अप्रैल | सम्पूर्णानन्द मिश्र | हिंदी कविता

जब -जब
धर्म और जाति ने
मानवता की नसों को
अपने क्रूरतम कृत्यों के चाकू से बेरहमी से काटा है

तब- तब
स्त्रियों ने अपनी माँग के
सिंदूर को पोंछा है

मासूम निर्दोष
बच्चों के पिता ने
उसकी ऊँगलियों को
निर्ममता से छोड़कर
उसे संघर्ष की भट्टी में झोंका है

जो बच्चे पिता के
कंधे पर
बैठकर कुछ देर पहले
पर्यटन -स्थल पर झूला झूल रहे थे
वे अब पितृ विहीन हो गए

पिता के बिना
उन्हें अब उन्हें जीना पड़ेगा

अब उन्हें
अपने कंधे पर कौन झुलायेगा?
बाजार के महँगे खिलौने कौन दिलायेगा?

मेहंदी के रंग ने
अभी पूरी तरह से
उन सोहागिन स्त्रियों के
शरीर को भिगोया भी नहीं था

कि
अचानक
उन्हें अपनी चूडियाँ स्वयं तोड़नी पड़ी
और वैधव्य की माला
पहननी पड़ी

देश के इतिहास का
सबसे काला दिन रहा
22 अप्रैल
जिसको याद करके खड़े हो जाते हैं रौंगटे

जिसमें
उम्मीदों का बलात्कार हुआ
अरमानों का गला घोंटा गया

पत्नी से पति
माँ से बेटा
बहन से भाई
पुत्र से पिता
का केवल अलगाव नहीं हुआ

बल्कि
मानवता की आँखें
हैवानियत की कैंची से
फोड़ी गयी

यह एक यक्ष प्रश्न है
केवल युधिष्ठिर से नहीं है
समस्त मनुष्य जाति से है

जिसके उत्तर की
जिम्मेदारी जाति विशेष से नही
मजहब से नहीं
बल्कि समस्त राष्ट्र से है

सम्पूर्णानन्द मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874

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