निष्कलंक तंतु (विरह गीत) | भारमल गर्ग “विलक्षण”

निष्कलंक तंतु (विरह गीत) 🌸

कालिंदी की लहरों में बिखरा, निशि का नीरव संवाद,  
तुम्हारी याद का अग्नि-कण, जलता है अधरों पर आज।  
विधाता के लेखनी से टपका, विषाद का अमृत-बूँद,  
क्योंकर भरूँ इस घड़े को, जब तुम्हीं हो स्रोत-सिन्धू?

वटवृक्ष की छाया तले, लिखी थी जो स्वप्न-लिपि,
आँधी ने छीन लिया वह, रह गया शेष केवल विपिन। 
फिर भी यह हृदय-तंतुनी बजाती अदृश्य वीणा,
तुम्हारे स्पर्श की सांकल, बन गई है अंतर-प्रेम॥  

अम्बर के पट पर लिखी, अक्षरों में तुम्हारी गाथा, 
विधाता ने बनाया सृजन, पर छूट गई एक रीत-रसाता।
कब तक सहे यह हृदय-व्यथा, कब तक रहेगी यह दूरी? 
मिलन का अमृत पिए बिना, कैसे जिएगी यह सुधा-भूमि?  

प्रलय के सागर-मंथन से, निकली जो ममता की मौक्तिक, 
वह अश्रु बन बह गई आज, इस नयन के मौन स्रोत-सिक्त।
पर यह तंतु अविच्छिन्न है, जैसे गंगा-यमुना संगम, 
मिलन का अमृत बनेगा, जब टूटेगा विधि का भ्रम॥  

तारों की बिंदियाँ टूटीं, चंद्रिका बनी विरह-राग। 
तुम्हारे बिना यह अधूरा, प्राणों का अनहद-आलाप॥ 
कल्पना के सागर में डूब, खोजूँ तुम्हारा स्मृति-चिह्न,
निष्कलंक तंतु यही है, प्रेम की अमर परिभाषा अबिन॥  

  • श्री भारमल गर्ग “विलक्षण”
  • सांचौर राजस्थान ३४३०४१

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