मरने लगते हैं आप | सम्पूर्णानंद मिश्र
मरने लगते हैं आप | सम्पूर्णानंद मिश्र
मरने लगते हैं आप
मरने लगते हैं
आप धीरे- धीरे
जब आपकी जिह्वा
सो जाती है
किसी की तारीफ किए बिना
मर जाते हैं आप
जब नहीं पढ़ते हैं
कोई पुस्तक
मर जाते हैं आप
जब किसी की मृत्यु
नहीं तैरती है
आपकी आँखों में
मर जाते हैं आप
जब पिता के आँसू
अपने विवेक के
रूमाल से नहीं पोंछ पाते हैं
मर जाते हैं आप
जब
आपके तलवे पर
छाले नहीं पड़ते
मर जाते हैं
धीरे- धीरे आप
आपके पड़ोसी के घर का
चूल्हा नहीं जलता जब
मर जाते हैं
धीरे-धीरे आप
जब आपकी संवेदनाएँ
लगंड़ी हो जाती हैं
मर जाते हैं
आप धीरे- धीरे
जब पराए
अपनों से अच्छे लगने लगें
मर जाते हैं आप धीरे- धीरे
जब आपकी आत्मा
आपकी जिस्म की पटरी से
उतर जाती है
मर जाते हैं
आप धीरे-धीरे
जिसमें आपकी
सोचने की शक्ति दम तोड़ देती है
सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874














