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Book Review| कराहती संवेदनाएं (काव्य-संग्रह)/समीक्षक- प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय, मारीशस - HindiRachnakar
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Book Review| कराहती संवेदनाएं (काव्य-संग्रह)/समीक्षक- प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय, मारीशस

Book Review| कराहती संवेदनाएं (काव्य-संग्रह)

समीक्षा

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समीक्षक- प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र  महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय, मारीशस
कराहती संवेदनाएं (काव्य-संग्रह) पल्लवी प्रकाशन
डी०750, गली- 4,अशोक नगर,
शाहदरा, दिल्ली-110093
मो.: 09856848581

मूल्य  : 250 /

सम्मति

कविता को सामान्य रूप से समझना हो तो धूमिल का सहारा लिए बिना नहीं समझा जा सकता- ‘कविता सबसे पहले एक सार्थक वक्तव्य होती है’-यह सार्थकता ही है जो कविता में प्राण फूंकती है।
यदि कविता सार्थक नहीं है तो वह चिरायु नहीं हो सकती। अतः हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि एक दीर्घजीवी कविता की आधार भूमि सार्थकता ही है। जहाँ तक डॉ. सम्पूर्णानन्द मिश्र की कविताओं का प्रश्न है, उनकी कविताएँ ‘स्व’ से ‘पर’ की यात्रा करती हुई ‘व्यक्ति का ‘समष्टि’ की ओर विस्तार करती हुई व्यक्ति से ऊपर उठकर समाज के हित की बात बड़े ही प्रभावशाली ढंग से रखने की सार्थक कोशिश भी करती हैं । कवि की कविताएँ निरंतर जनता से संवाद करती हैं। आज की बदली हुई फ़िज़ा में ऊपर से नीचे तक जब ज़िम्मेदारियों से मुँह चुराने की होड़ लगी हो, जन सरोकारों से जुड़े लोग हाशिये पर चले गए हों, घनघोर निराशा का माहौल हो तो ऐसे में कविताओं का धारा के विपरीत बहने का साहस कवि के ईमानदार रचनाकर्म को द्योतित करती हैं और तेज आँधियों के खिलाफ एक जलती मशाल की तरह अडिग बन उम्मीद की रोशनी देती हैं।
‘कराहती संवेदनाएँ काव्य संग्रह सम्पूर्णानन्द जी की उसी श्रम साधना का प्रतिफल है। उक्त संग्रह की कविताओं से जनसरोकारों का आभास मिलता है क्योंकि जनसरोकार वह कसौटी है जिसपर कविताओं की उपयोगिता व प्रासंगिकता का मूल्यांकन किया जाता है। जहाँ तक इन कविताओं के मूल्यांकन का प्रश्न है, इनमें सामाजिक सरोकार से जुड़े तमाम ज्वलंत मुद्दे एक सार्थक बहस की माँग करते हैं। जीवन और जगत के टूटते-बिखरते हर रिश्ते-नाते के बीच एक उम्मीद की किरण अवश्य दिखाई देती है जो कवि की सकारात्मक वैचारिकी और उच्च रचना-कर्म का परिचायक है। सही अर्थों में ये कविताएँ एक ओर समाज की अग्रिम पंक्ति में जलने वाली मशाल की तरह हैं, जो एक सुखद और मंगलकारी राह दिखाती है तो वहीं दूसरी ओर व्यवस्था की संवेदनहीनता के साथ-साथ समाज के सफेदपोश वर्ग की उदासीनता और उपेक्षा भाव पर प्रहार करने में जरा भी चूकती नहीं है ।
कहते हैं कि उत्कृष्ट व्यंग्य की कोख से करुणा का जन्म होता है और कवि जिस समाज का प्रतिनिधित्व करता है उस समाज की कमज़ोर कड़ी को उजागर करने में कोई कसर नहीं छोड़ता है। आज जीवन जीना दुष्कर हो गया है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार की तिकड़ी ने समूची मानवता को बदतर बना दिया है। कवि का इन परिस्थितियों से आहत व क्षुब्ध होना स्वाभाविक है जीवन-संवर्ष को कविता में यथावत चित्रित करने में कवि कोताही तो नहीं बरतता है किन्तु अपनी प्रतिबद्धता से आम आदमी के प्रति अपनी संवेदना रखने में सतत प्रयत्नशीत है। इनकी कविता में सुविधाभोगी समाज न होकर संघर्षरत समाज की धारदार उपस्थिति है। अधिकार व कर्तव्य से जुड़ी संविधान की बातें ज़मीन पर न आने की पीड़ा कवि की लेखनी से यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रकट होती है । कथ्य की दृष्टि से डॉ. मिश्र की कविताएं धूमिल और मुक्तिबोध से स्वतः जुड़ती हुई दिखती हैं धूमिल और मुक्तिबोध दोनों को अपने-अपने समय में व्यवस्था से जूझना पड़ा था। वे स्थितियाँ आज भी यथावत है, तभी तो कविता की कराह भी आज उन स्थितियों को चुनौती देने वाला औजार बनी हुई है कवि की प्रतिबद्धता वंचित शोषित व उपेक्षित वर्ग के प्रति यथावत है क्योंकि वहाँ आज भी अभाव, अशिक्षा, भुखमरी और संघर्ष का महासाम्राज्य कायम जो है । कवि के चारों ओर जो भी बिखरा है, फैला है या कि पसरा है सभी कुछ उसकी लेखनी को ऊर्जा प्रदान करते हैं तथा दृष्टि सम्पन्न भी बनाते हैं। फिर भी कुछ कही और बहुत कुछ अनकही कविता में अपना स्थान ढूंढ़ती हैं। कभी कविताएं कवि को लिखती हैं तो कभी कवि कविता को। दोनों मिलकर काव्य संवेदना को एक रचनात्मक मुकाम पर ले जाते हैं। बहुत कुछ खोजने की तलाश में ये कविताएं स्मृतियों के घने जंगलों से लेकर नदी, पहाड़, रेगिस्तान से होती हुई गाँव की पगडंडियों और खेतों तक जाती हैं, साथ ही जीवन के अनेक दृश्यों को स्पर्श करती चलती हैं। इन्हीं दृश्यों ने जीवन को गहरे तक छुआ भी है और कविता की प्रतिकृति के रूप में अपने को ढल भी जाने दिया है।
समाज की प्रतिरोधी चेतना को भाषा हमेशा धार देती है और शब्द कविता में ढल कर और तीखा हो जाते हैं फिर बिना किसी लाग-लपेट के सब कुछ कह जाते हैं तथा पाठकों के लिए सवाल खड़ा कर उनमें बेचैनी पैदा करने की कोशिश भी करते हैं।
इस कृति की प्रायः सभी कविताएँ आम के लिए खास की माँग करती हैं। ये कवितायें पाठक के लिए कितनी उपयोगी हैं, इसका फैसला तो पाठक ही करेगा किन्तु मुझे विश्वास है, ये कवितायें जन सामान्य के जीवन-संघर्ष में नवीन ऊर्जा का समाचार करेगी। इस कृति की हर कविता अपने समय की एक कहानी जी रही होती है, अपने समय की एक कथा कह रही होती है साथ ही साथ अपनी तरह से कृतिकार के स्वर भी मुखरित कर रही होती है।
कृति की कविताएँ अपने भीतर के कंपन की प्रतिध्वनि को मानवीय स्तर पर तोड़ती है तो कहीं अपना एक व्याकरण और मानचित्र भी गढ़ती हैं, जिसमें विविधताएं नवांकुर बन जीवन पाती हैं । जहाँ तक कविता में भाषाई संरचना और वैशिष्ट्य की बात है, तो वह कदम-कदम पर ध्यानाकृष्ट अवश्य करती हैं और पाठकों को बाँधकर रखती भी हैं। यद्यपि बाँधे रखना एक चुनौती है। लेकिन चुनौती को सहर्ष स्वीकार करना कवि की नियति भी तो है।
आशा करता हूँ ‘कराहती संवेदनाएँ’ की कविताएँ पाठकों को झकझोरेंगी और प्रतिकार के स्वर बुलंद करेंगी।
डॉ. संपूर्णानंद की रचनाधर्मिता सृजन के नित नूतन गवाक्ष खोले, यही कामना है।

प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र, महासचिव विश्व हिंदी सचिवालय, मारीशस

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