वसुधैव कुटुंबकम् / हूबनाथ

वसुधैव कुटुंबकम् / हूबनाथ हमारी बस्तियाँभले पक्की हो गई हैं घरों में बन गएशौचालयतुम्हारे घरों की तरह हमारे कपड़ेतुम्हारी तरह साफ़सुथरे हो गए हमें भी मिलने लगीदो वक़्त की रोटीभरपेट … Read More

पॉव भटक न जायें सुन तू / हरिश्चन्द्र त्रिपाठी’ हरीश’

पॉव भटक न जायें सुन तू / हरिश्चन्द्र त्रिपाठी’ हरीश’ कॉटों भरी डगर जीवन की,जिस पर तुझको चलना है,पॉव भटक न जायें सुन तू,प्यारी मेरी ललना है। टेक। तुझे पता … Read More

तुम्हारी तोतली बोली / पुष्पा श्रीवास्तव शैली

तुम्हारी तोतली बोली / पुष्पा श्रीवास्तव शैली तुम्हारी तोतली बोलीजब धीरे धीरे बदलने लगीसाफ आवाज में ,तब भी मैं डरी।तुम्हारे नन्हे कदम जबबिना मेरे सधने लगेतब भी मैं डरी।तुम्हारी आंखों … Read More

मैं सहज ,शाश्वत युग ध्वनि हूं / श्रवण कुमार पान्डेय,पथिक

गुन्जन अक्षुष्ण जिसका सर्वथा,मैं सहज ,शाश्वत युग ध्वनि हूं,! प्रवाह,पावन पवन का ,मुझमें समाया,कृति समर्थ,रविदाह ने मुझको तपाया,मुझमें समाहित,नीरवत निर्मल तरलता,मुझको सुलभ है व्योमवत ,इक क्षत्रता, जिससे सरस जीव जीवन,सुहृद … Read More

कौन हवाओं से पूछेगा / हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश

सजलकौन हवाओं से पूछेगा, पल-पल प्रियवर याद तुम्हारी,तड़पा जाती है,गुलशन के हर गुल-ओ-खार को,महका जाती है।1। राख हुए जंगल सी बस,अपनी राम-कहानी,दो पल रुककर पागल मन को,समझा जाती है।2। तन्हॉ … Read More

विमुख / सम्पूर्णानंद मिश्र

विमुख / सम्पूर्णानंद मिश्र सत्य से विमुख व्यक्तिफोटो की तरफ़ भागता हैक्योंकिभीतर अपने अमा लेता हैफोटोपेट के पाप कोऔरनिष्पाप चेहरादिखाता है समाज कोवैसे आजकलएक चेहरे सेजीवन जीनापानी पर लकीरें खींचना … Read More

जब जागता श्री संत हो | मधुमालती छंद | बाबा कल्पनेश

जब जागता श्री संत हो विषय-जब जागता श्री संत हो छंद-मधुमालती अब रात की वेला मुई।यह प्रात की वेला हुई।भरती महक है घ्राण में।संचार शुभ है प्राण में।। अब जागिए … Read More

विवशता /सम्पूर्णानंद मिश्र

विवशता संवादके लिए माध्यमबहुत जरूरी होता हैलेकिनजब माध्यम हीपक्षपात के ऐनक सेघटनाओं कोदेखने- सुनने और अभिव्यक्तकरने लगेतोनहीं कोई रोक सकता हैलाक्षागृह मेंआग लगने सेइसलिएझूठ और कपट के शोर मेंयदि सत्य … Read More

बहुरूपिया समाज /सम्पूर्णानंद मिश्र

बहुरूपिया समाज /सम्पूर्णानंद मिश्र बहुरूपिया समाज अपशकुनमानी जाती हैंस्त्रियांअगर वैधव्यका काला धब्बाउनके माथे पर होचूड़ियां तकतोड़वा दी जाती हैंदूर बैठायी जाती हैंधार्मिक और शुभक्रिया कर्मों के अवसर परअपमान और जलालतकी … Read More

पत्र की व्यथा/ सम्पूर्णानंद मिश्र

पत्र की व्यथा/ सम्पूर्णानंद मिश्र पत्र अपनी व्यथासुना रहा थाअतीत के सुखद दिनकी गाथा गा रहा थालोग दिल की बात पत्रपर लिख जाते थेप्यार की बातें कह जाते थेमहीनों पोस्टआफिसके … Read More

मृत्यु के बाद / सम्पूर्णानंद मिश्र

मृत्यु के बाद / सम्पूर्णानंद मिश्र लेकर जाती हैऔरत अपनी मृत्यु के बादघर की समृद्धिबच्चों का बचपनबेटियों का अल्हड़पनघर की दीवारों‌ की मुस्कुराहटचौखट की गोपनीयताखिड़कियों की रौशनीचूल्हे- चौकों की मर्यादाआंगन … Read More

पुष्पा श्रीवास्तव शैली की कविता | बौने स्वप्न | बुझता है दीप अंबे ज्ञान का प्रखर देखो

पुष्पा श्रीवास्तव शैली की कविता | बौने स्वप्न | बुझता है दीप अंबे ज्ञान का प्रखर देखो बौने स्वप्न हमने बोए कुछ स्वप्न,कुछ उगे,बढ़ेऔर कुछ बौने रह गए।बौने रह गए … Read More

बदलते चेहरे / आकांक्षा सिंह ‘अनुभा’

बदलते चेहरे अक्सर चेहरों को रंग बदलते देखा है। आपके सामने कुछ और।। दूसरों के सामने कुछ और होते देखा है। अक्सर चेहरों को रंग बदलते देखा है।। सुनते तो … Read More

मुसाफिर हम मुसाफिर तुम / नरेंद्र सिंह बघेल

मुसाफिर हम मुसाफिर तुम | नरेंद्र सिंह बघेल मुसाफिर हम मुसाफिर तुम ,किसी का क्या ठिकाना है ।कि खाली हाँथ आए हैं ,औ खाली हाँथ जाना है ।फकत रह जाएगीं … Read More

कब के बिछुड़े | ढूढ़ती हूं | पुष्पा श्रीवास्तव शैली

कब के बिछुड़े | ढूढ़ती हूं | पुष्पा श्रीवास्तव शैली १. कब के बिछुड़े कब के बिछुड़े आज फिर जब तुम मिले तोमोर सा मन आज फिर से नाचता है।हो … Read More