चुटकी भर सिंदूर | जनकवि सुखराम शर्मा सागर
चुटकी भर सिंदूर | जनकवि सुखराम शर्मा सागर
चुटकी भर सिंदूर
सातों वचनों से जो बंध जाए,
चुटकी भर सिंदूर मांग भर जाए,
तात मात अवलंब ढूंढ ढूंढ कर,
घरी धरोहर वापस कैसे घर लाए।
नारी का सुहाग जब लुट जाए।
जब नारी पर भारी विपदा आए,
अर्धांगिनी का सुहाग लुट जाए,
तन मन धन सब करे समर्पित,
अपनी बेटी क्यों समझ ना पाए।
नारी का सुहाग जब लुट जाए ।
भूखे रहकर कुछ अंत में खाए,
सबकी परवरिश में जान लगाए,
प्रथम शिक्षिका घर की बनकर,
ऐसी अबला घर जगह न पाए।
नारी का सुहाग जब लुट जाए।
आपकी बेटी मेरी बेटी यही समझ,
दुनिया भर का रिश्ता माना जाए,
है समाज परिवार की जिम्मेदारी,
सिंदूर की खातिर ना अभागिन कहलाए।
नारी का सुहाग जब लुट जाए।
जनकवि सुखराम शर्मा सागर रायबरेली 91 25630310














