पुरानी दिल्ली के प्लेटफार्म नंo 11 पर लिखी एक रचना | ट्रेन की प्रतीक्षा में

पुरानी दिल्ली के प्लेटफार्म नंo 11 पर लिखी एक रचना
-ट्रेन की प्रतीक्षा में

-दिल्ली से बाहर हूँ

जब से होश सँभाला हूँ
या यूँ कहिए कि

देखता आ रहा हूँ
मुर्दा बचपन से

मुर्दा
वह है
जिसका
हृदय बंद कर दे
स्पंदन करना

जिसे चार लोग
बाँस पर लेटाकर
फूँक आते हों
श्मशान घाट पर

नौ मन लकड़ी में
जल जाता है
जिसका धर्म- कर्म

नहीं लौट सकता वह
कर्मस्थल पर चाहकर भी

उसे
मुर्दा कहते हैं
संसार की बोधगम्य भाषा में

लेकिन
इन सबसे अलग
एक विचित्र जीव
मुझे दिखलाई पड़ा
दिल्ली शहर में

हाँ
वह मानव था
और मानव की तरह
और अन्य क्रियाएँ भी थीं
उसकी

खा- पी रहा था
बिल्कुक इंसानों जैसा
मीठा- मीठा बोल भी रहा था

लेकिन
नहीं थीं
उसकी कुछ हरकतें
आम मनुष्यों की तरह

उसकी आँखों से
आँसू की जगह
पत्थर का कोई सूक्ष्मतम
लाल कण निकल रहा था

यह जीव
मुर्दा ढोते- ढोते मुर्दा हो गया था

कई मुर्दे
इसके घर में हैं
दिन भर उन्हें यह ढोता है

किसी को दफ्तर छोड़ना
किसी को स्कूल
किसी को बाजार

मुर्दा ढोते- ढोते
इसकी सारी संवेदनाएँ
मुर्दा हो गईं थीं

रात- दिन
मुर्दों से घिरा रहता है

जैसे ही
घंटी घनघनाती है
इसके मोबाइल पर

उसकी घनघनाहट से
डर जाता है
कि
कोई गाँव से
अभ्यागत आना चाहता है

मुर्दे नहीं
बोलते हैं

लेकिन
यह बोलता है
उधर की
आवाज से पहले

भाई साहब
मैं इस समय
दिल्ली से बाहर हूँ!

पीछे से कुछ और आवाज
सुनाई पड़ती है
और मुर्दों की

सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर वाराणसी
7458994874

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