“हम तीन बहनें- राख से उगता सूरज”। आकांक्षा सिंह “अनुभा”

“हम तीन बहनें- राख से उगता सूरज”।

लेखिका: आकांक्षा सिंह “अनुभा “
उद्घोषिका आकाशवाणी रायबरेली ।

ज़िंदगी में अगर कोई रिश्ता ऐसा है,
जिसमें बिना कहे सब समझा जाता है —
तो वो है बहनों का रिश्ता।

मैं आकांक्षा हूँ — तीन बहनों में सबसे बड़ी।
यह कहानी है मेरी, और मेरी दो परछाइयों की —
यामिनी और शुभांगीनी।

ये कोई राजकुमारी की परियों जैसी कहानी नहीं,
ये उन तीन सामान्य लड़कियों की कहानी है,
जो एक ही आँगन में पलीं, हँसीं, लड़ीं, और एक-दूसरे को थामे रहीं।

मैं, उनकी दीदी।

जब मैं बच्ची थी, शायद खुद के लिए कभी बच्ची नहीं रही।
दो नन्हें हाथों को पकड़कर स्कूल ले जाती थी —
एक यामिनी का, एक शुभांगीनी का।

मैं उनकी दीदी नहीं, शायद उनकी छोटी मां बन चुकी थी।
उनके कपड़े, उनके बाल, उनकी कॉपियाँ — सब कुछ मेरा ज़िम्मा था।

वो मुझसे डरती भी थीं —
क्योंकि जब मेरी आँखों में गुस्सा आता था,
तो जैसे बादल गरजते थे।

लेकिन फिर भी हर चोट पर वो मेरी ही गोद में आकर सिर रखती थीं।

यामिनी — मेरी जिद्दी मगर चुपचाप समझदार बहन

यामिनी — मेरी ठीक पीछे वाली बहन।
कभी-कभी लगता था, वो मेरी परछाईं है —
लेकिन अपनी जिद और समझदारी से कई बार मुझसे भी आगे निकल जाती थी।

छोटी-छोटी बातों पर अड़ जाना उसका स्वभाव था,
लेकिन अपनी बहनों के लिए बिना कहे त्याग कर देना उसकी फितरत।

उसने कभी दिखाया नहीं, लेकिन मैं जानती हूँ —
जब भी कोई उसे कुछ कहता था,
तो वो पहले मेरी तरफ देखती थी — जैसे पूछ रही हो:
“दीदी, मैं ठीक हूँ ना?”

गज्जू — हमारी सबसे नन्ही परी

और फिर आती है हमारी सबसे छोटी —
शुभांगीनी, जिसे हम प्यार से गज्जू कहते हैं।

वो घर की रौनक थी।
उसकी हर शरारत पर पूरा घर हँसता था —
सिवाय मेरे।

क्योंकि हर बार शरारत के बाद जब सवाल उठता,
तो वही मासूम सी शक्ल बना लेती —
और दोष जाता यामिनी या मेरे सिर।

लेकिन क्या बताऊँ —
जब वो मुस्कुराती थी, तो गुस्सा भी मुस्कुरा देता था।

मैं पीछे रह गई, ताकि वो आगे बढ़ सकें

मैंने कभी शिकायत नहीं की —
क्योंकि मुझे लगता था, मेरी खुशी उनकी मुस्कान में है।

जब मैंने पढ़ाई छोड़ी, ताकि घर संभाल सकूँ —
या जब कोई पसंद की चीज़ छोड़ी, ताकि उनके लिए कुछ जुटा सकूँ —
तो दिल भारी हुआ, लेकिन आत्मा शांत रही।

क्योंकि वो मेरी बहनें थीं।
और उनके सपने, मेरी आंखों की चमक थे ।

अब जब हम दूर हैं…

अब हम तीनों अलग-अलग जगहों पर हैं।

यामिनी आज भी समझदारी की मिसाल है।
गज्जू अब भी हमारी शरारतों की रानी है।

और मैं?
मैं अब भी वहीं हूँ —
एक को रास्ता दिखाने वाली,
और एक को थामने वाली।

जब भी फोन पर तीनों एक साथ होती हैं,
तो वक़्त रुक जाता है।
लगता है जैसे वो आँगन, वो रसोई, वो बरामदा —
आज भी वहीं है…

बस एक फर्क है —
अब हमारी हँसी स्क्रीन पर आती है,
लेकिन हमारे रिश्ते आज भी दिलों से जुड़े हैं ।

मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि अगर कोई है,
तो वो है —
एक बहन होना।

यामिनी और शुभांगीनी —
तुम दोनों मेरी ज़िंदगी की सबसे सुंदर कविता हो।
और मैं बस एक पंक्ति हूँ —
जो उस कविता को अर्थ देती है।

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