मुड़े हम आज जगत से जगदीश्वर की ओर | विश्वास ‘लखनवी’
मुड़े हम आज जगत से जगदीश्वर की ओर | विश्वास ‘लखनवी’
मुड़े हम आज जगत से जगदीश्वर की ओर
निगल कर मधुर तमस की निशा हुई है भोर
हुये उत्तीर्ण किये बिन शोर
परीक्षा ली अपनी झकझोर
आ गया हाथ दूसरा छोर
पार कर दुर्गम पथ घनघोर
चीर कर कई विरोधाभास
हुई मति निर्मल भाव विभोर।
मुड़े हम आज जगत से जगदीश्वर की ओर
निगल कर मधुर तमस की निशा हुई है भोर
न आया रास किसी से बैर
हमेशा चाही सब की खैर
बहुत थी करनी लम्बी सैर
भावना आई सागर तैर
हुआ तन मोह-पाश से मुक्त
चेतना लेने लगी हिलोर ।
मुड़े हम आज जगत से जगदीश्वर की ओर
निगल कर मधुर तमस की निशा हुई है भोर
ख़त्म हैं जहां सभी गुण दोष
मित्र है एक परम संतोष
नेह का मिला है ऐसा कोष
हर्ष से गिरा करे उद्घोष
भाग जगे गुरु परमेश्वर की
शीश पर हुई कृपा की कोर ।
मुड़े हम आज जगत से जगदीश्वर की ओर
निगल कर मधुर तमस की निशा हुई है भोर
तना है ऐसा यहां वितान
न कोई जहां मान अपमान
असंभव जहां सभी अनुमान
मिला उन चरणों में स्थान
मगन ‘विश्वास’ हुआ निश्चिंत
हाथ में सौंप सजन के डोर।
विश्वास ‘लखनवी’














