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चेतक का रण- कौशल एवं स्वामी- भक्ति / सीताराम चौहान पथिक - HindiRachnakar

चेतक का रण- कौशल एवं स्वामी- भक्ति / सीताराम चौहान पथिक

हल्दी घाटी संग्राम  जून 1576

चेतक का रण- कौशल एवं स्वामी- भक्ति

 महाराणा प्रताप जयंती पर यह चेतक का प्रसंग सीताराम चौहान द्वारा स्वरचित   खण्ड काव्य स्वाभिमानी महाराणा प्रताप से लिया है क्योंकि हल्दी घाटी की गाथा बिना चेतक के अधूरी है।

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चेतक का रण- कौशल एवं स्वामी- भक्ति ।।

प्रताप के प्रहार से ,
गूंजी धरा – गूंजा  गगन ।
जय-जय पुकारा पवन ने ,
धूं -धूं  दहक उठी अगन ।

चेतक प्रताप का स्वामि- भक्त
अनुभवी और रण-कुशल अश्व ।
स्वामी के संकेत  – मात्र से ,
प्रलय मचा दे – गज़ब अश्व ।

चेतक सवार राणा ने देखा ,
हाथी-हौदे पर मान सिंह ।
चेतक को एड लगा तेजी से ,
पहुंच गए सम्मुख प्रताप सिंह

चेतक अगले दो पैरों से ,
गज-मस्तक पर आरूढ़ हुआ
राणा प्रताप का मान सिंह पर
भाला-प्रहार भरपूर हुआ ।

विद्युत-गति से झुके मान सिंह
हाथी-हौदे की लेकर ओट ।
भाला विदीर्ण कर निकल गया ,
महावत के वक्षस्थल को फोड़

चेतक हिनहिना उठा- गरजा ,
रण में नहीं छोड़ी कोई कसर।
चेतक-सवार राणा ने भी ,
रण में बरसाया खूब कहर ।

कटि से कटार ले राणा ने ,
मान सिंह पर वार किया ।
निर्णय लेने में चूक हुई ,
समझे – मान सिंह मार दिया।

हुआ बुद्धि- विभ्रम राणा को ,
चेतक को दृग – संकेत  किया।
गज-मस्तक पर थे टिके पाॅव ,
चेतक ने भू पर टेक दिया ।

गज ने अपनी तलवार-सूॅड से
सहसा चेतक पर वार किया ।
दुर्भाग्य – हाय चेतक का पग ,
तलवार-सूॅड ने काट दिया ।

चेतक की देखो स्वामि-भक्ति
राणा को आभास न होने दिया ।
घायल गम्भीर पीड़ा झेली ,
फिर भी वीरोचित साथ दिया

 


चेतक का बलिदान


घाटी प्रवेश करते प्रताप को ,
पहचान गए दो मुगल वीर ।
दोनों के अश्व लगे पीछे ,
चेतक ने रची नयी तहरीर ।

राणा प्रताप नहीं देख सके ,
चेतक-पग की रक्तिम धारा ।
पशु की स्वामि- भक्ति देखो ,
राणा पर जीवन को वारा ।

दूरस्थ मुगल सैनिक दोनों ,
राणा के पीछे लगे हुए ।
चेतक अशक्त लोचन उसके ,
स्वामी- रक्षा में लगे हुए ।

सहसा इक छोटा सा नाला ,
चेतक – पथ में दीवार बना ।
लम्बी छलांग कर पार उसे ,
तत्काल स्वर्ग सिधार गया ।

इस बीच शक्ति सिंह ने आकर ,
दोनों का काम तमाम किया
थे शक्ति सिंह अकबर साथी ,
भ्रातॄत्व – प्रेम ने काम किया।

चेतक था अथवा पवन-वेग ,
विद्युत-गति से उड़ जाता था ।
करके अरि-सेना का मर्दन ,
दल में अपने मुड़ आता था ।

आज वही चेतक भू पर ,
दृग अंतरिक्ष  में लगे हुए ।
राणा प्रताप रोए जी – भर ,
पशु मोह-पाश में बंधे  हुए।


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सीताराम चौहान पथिक
नई दिल्ली ।

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