लड़कों की जिंदगी /अभिमन्यु पाल आलोचक

लड़कों की जिंदगी

जमाने के मुताबिक सांसो को चलाना पड़ता है,
दिल की ख्वाहिशों को दिल में ही दफनाना पड़ता है,
आंसुओं को कभी रुमाल से तो कभी

मुंह धोकर छुपाना पड़ता है,
कोई जब हाल पूछे तो ठीक हूं यह बताना पड़ता है,
हम लड़कों की जिंदगी तो एक पेंड़ की तरह है
अपनों के लिए अपना वजूद मिटाना पड़ता है,
ना चाहते हुए भी मुस्कुराना पड़ता है,
अपने सपनों की चिता जलाना पड़ता है।

घर बनाने के लिए घर से ही दूर हो जाते हैं,
चंद खुशियों के लिए पलायन को मजबूर हो जाते हैं,
बचपन के सपने जवानी में दुर्लभ कोहिनूर हो जाते हैं,
हम जिंदगी में कुछ नहीं कर पाये इस बात के लिए

मशहूर हो जाते हैं,
दुनिया की चकाचौंध में लक्ष्यविहीन कांच सा चूर चूर हो जाते हैं,
ताने सुन सुनकर ढीठ, निकम्मा, बेगैरत, बेशर्म और घूर हो जाते हैं,
जिम्मेदारियों तले दबकर वक्त से पहले जवान हो जाना पड़ता है,
हम लड़कों की जिंदगी तो एक पेड़ की तरह है
अपनों के लिए अपना वजूद मिटाना पड़ता है,
ना चाहते हुए भी मुस्कुराना पड़ता है,
अपने सपनों की चिता जलाना पड़ता है।

आजकल प्यार तो सभी कर लेते हैं,
पर निभा वही पाते हैं जिनकी आंखों में पानी नहीं,
जब ना मिले महबूब तो झेंप मिटाते हुए कहते हैं,
हमारा इश्क तो रूहानी है जिस्मानी नहीं,
हर धड़कते दिल में छुपी हुई है एक दर्द भरी कहानी,
जिसके साथ ऐसा नहीं उसकी जवानी कोई जवानी नहीं,
घाव भीतर के रिस रिसकर नासूर बन जाते हैं,
लोग हाल सुनकर मुस्कुराते हैं, मजा लेते हैं,
इसीलिए हाले दिल की कहानी किसी को सुनानी नहीं,
हमारी मोहब्बत तो कोहरे की तरह होती है महबूबा के सिवा और कुछ दिखता ही नहीं,
अक्सर गीले धुंध में गलतियों से टकराना पड़ता है,
हम लड़कों की जिंदगी तो एक पेड़ की तरह है
अपनों के लिए अपना वजूद मिटाना पड़ता है,
ना चाहते हुए भी मुस्कुराना पड़ता है,
अपने सपनों की चिता जलाना पड़ता है।

अब रोशनी रास नहीं आती हमें अंधेरा पसंद है,
कुछ कड़वी जुबानें अक्सर कहती हैं तेरी जिंदगी झंड है,
कभी तन्हाइयां सताती हैं, कभी रुसवाईयां सताती हैं,
हमें तो अपने जिस्म की हर अंगड़ाइयां सताती हैं,
हम पर दबाव बहुत होता है इस जमाने का,
मां बाप का, रिश्तेदारों का, दोस्तों का, प्रेमिका का, कुछ अजनबियों का,
अलग अलग ही सही लेकिन कुछ पाने का,
ओखली में सिर मारूं या सिर पर ओखली, फूटनी तो हमारी है,
हमारा छोटा सा दिल कच्चा माल बन गया और यह दुनिया व्यापारी है,
जिसे चाहो वह दूर भागता है इश्क हो, सफलता हो, दोस्ती हो, या परिवार,
और जिसे ना चाहो ऐसे आकर गले लगता है जैसे सालों का बिछड़ा यार,
हमें माशूका चाहे या ना चाहे पर मुसीबतें बहुत चाहती है,
और जो हमें दिल से चाहे कद्र करके उसे अपनाना पड़ता है,
हम लड़कों की जिंदगी तो एक पेड़ की तरह है
अपनों के लिए अपना वजूद मिटाना पड़ता है,
ना चाहते हुए भी मुस्कुराना पड़ता है,
अपने सपनों की चिता जलाना पड़ता है।

रचनाकार
अभिमन्यु पाल आलोचक

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