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Short Poem on Guru Purnima in Hindi | आदर्श शिष्य आरुणि - HindiRachnakar

Short Poem on Guru Purnima in Hindi | आदर्श शिष्य आरुणि

Short Poem on Guru Purnima in Hindi | आदर्श शिष्य आरुणि

hort- Poem- Guru- Purnima- Hindi (1)

गुरु जी के प्रति शिष्य के भाव- सुमन ।

गुरु वर श्रद्धेय हमें तुमने ,
अपनी छाया में पाला था ।
अपने सुंदर  कर-कमलों से ,
कोमल माटी को ढाला था ।

अनघड़ को रूप विचित्र दिया
व्यक्तिव निखारा था तुमने ।
हम थे अबोध अज्ञान भरे ,
गुरुदेव, संवारा  था तुमने ।

हम तुम्हें भूल जाएं कैसे ,
क्या कलियां भूली माली को
हम फूल तुम्हारे अपने हैं ,
कैसे छोड़ेंगे डाली को ?

हे विप्र ज्ञान के सूर्य सदा ,
आशीष हमें देते रहना ।
साहस का सम्बल थाम सकें ,
वह मंत्र – बीज देते रहना ।

गुरुदेव तुम्हारे आदर्शो को ,
जीवन में हम ढाल सकें ।
तुम सदा मार्गदर्शक रहना ,
अन्याय-कुपथ को टाल सकें।

हम विनय आपसे करते हैं ,
करना कॄतार्थ मॄदु वचनों से ।
हमसे यदि भूल कोई हुई हो ,
क्षमा करें मॄदु वचनों से ।

हे जीवन-उपवन के माली ,
मेरे जीवन के कुम्भ- कार।
मन-मन्दिर में रहना सदैव ,
मिट जाए गहरा अंधकार  ।

आशीष-हस्त सिर पर रखना ,
जीवन – संमार्ग  दिखा देना ।
हम आज अधर में लटके हैं ,
गुरुमंत्र कोई बतला देना ।

इस विद्यालय से विदा समय ,
कर-बद्ध प्रार्थना करते हैं ।
संमार्ग  दिखाना, यदि भटके ,
गुरुदेव, याचना करते हैं ।

श्रद्धेय , हॄदय में आप रहें ,
बन कर स्नेह की छाप रहें ।
हम लक्ष्य-प्राप्ति में हों सक्षम,
आदर्श पथिक यदि आप रहें।


आदर्श शिष्य आरुणि

एक दिवस महर्षि थौम्य ने ,
शिष्य आरुणि को कहा बुलाए ।
वर्षहि बीच जाओ औ, देखो ,
खेतों में जल भर ना जाए ।।

शिरोधार्य कर गुरु की आज्ञा ,
पहुंचा शिष्य खेत के पास ।
देखा जल बह रहा खेत में ,
कोशिश की कुछ करके आस।

जल के तीव्र वेग से हाय ,
हुआ प्रयास विफल आरुणि का ।
बांधे मेढ  – बह जाए माटी ,
लगता था प्रकोप वरुण का ।

लेट गया वह शिष्य उसी क्षण
औंधे मुख मेढ के पास ।
बीत गई यो अर्ध-रात्रि भी ,
प्रातः शांत  हुआ जल रास ।

ना लौटा जब शिष्य रात्रि भर,
चिंतातुर गुरु खोजन आए ।
आरुणि-आरुणि वत्स कहां हो ?
कह कर वे चहुं दिशि में धाए।

गुरुदेव, यहां पर हूं मैं ,
इक संकेत  से कीन्हां ।
देखा गुरु ने यह दॄष्य ,
स्नेह भर वक्षस्थल लीना ।

प्रिय शिष्य , तुम से हों प्रकाशित ,
वेद की श्रुतियां सभी ।
मेरा शुभ आशीर्वाद है ,
महर्षि बनोगे तुम कभी ।

गुरु की सहर्ष आशीष से ,
आरुणि तभी कॄत कॄत हुआ ।
आगामी जीवन में उद्दालक ,
नाम का महर्षि बना ।।

hort- Poem- Guru- Purnima- Hindi (1)
सीताराम चौहान पथिक

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