जानवर भीतर का/सम्पूर्णानंद मिश्र
जानवर भीतर का
जानवर भीतर का
न जाने कब से
देहगाड़ी पर
भीतर के मरे हुए पशु को
ढोते रहे यूँ ही
हर बार
फेंकते रहे सड़क पर
बियाबान में
बज्र बेहया है
उग आता है
नागफनी सरीखा
उगते उगते
देह के एक कोने में
पैना नुकीला विषाक्त बाण
धँसता चला जाता है
बार बार मरते हैं हम
वह बार- बार
हो जाता ज़िंदा
निरंतर चलता संगर
कौन कितनी बार मरा
कितनी बार उगा
पता लगाना
नामुमकिन
किंतु जीतता वही
हर बार
जानता है वह
कमज़ोरी हमारी
पहचानता है
देह के उस हिस्से को
धारदार सींग गड़ाता है
जहाँ मुंँह चिढ़ाती है
हमारी भाषा हमें
बार- बार धिक्कारती है-
तुम्हारे भीतर का जानवर
तब तक रहेगा ज़िंदा
सही मायने में
जब तक भीतर पैठा है
हैवानियत का नाख़ून
नहीं झरेगा पूरी तरह

सम्पूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर
7458994874
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