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२ जून की रोटी | दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’

२ जून की रोटी

सारा दिन,धूप ओढ़कर,
मज़दूरी जब होती ।
तब जाकर के खानें को,
दो जून की रोटी मिलती।
सिर का पसीना बहते-बहते,
जब पांवों तक आ जाता।
पांच बजे के बाद में उसको,
कुछ रुपया मिल जाता।
उन रुपयों को पाकर के,
आशा की कली है खिलती।
तब जाकर के खानें को,
दो जून की रोटी मिलती।
बच्चों के पालन-पोषण को,
कितना कठिन परिश्रम करता।
तब जाकर अपने बच्चों का,
खाली पेट वह भरता।
धूप में जब तप करके आता,
बदन में भट्ठी जलती।
तब जाकर के खानें को,
दो जून की रोटी मिलती।
थका हुआ दिनभर का मारा,
जब शाम को घर वह आता।
टूटी खाट में लेटे-लेटे,
ईश्वर के गुण गाता।
रोज-रोज मेहनत के बल पर,
घर की गृहस्थी चलती।
तब जाकर के खानें को,

दो जून की रोटी मिलती।

(अप्रकाशित,सभी अधिकार रचनाकार के अधीन)
दुर्गा शंकर वर्मा ‘दुर्गेश’
रायबरेली।

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