कोहरे कि रातें/प्रदीप त्रिवेदी दीप

कोहरे कि रातें


कोहरे कि रातें ठंडे बदन
काँप रहे गातऔर काँप रहे मन
शीत में ठिठुरती है कांपती जुबानें
आज कटेंगी कैसे रात राम जाने।
बिलख रहे पक्षी गण
बिलखता चमन
कोहरे की रातें ठंडे बदन
काँप रहे गात और काँप रहे मन।
सांस से निकलती है
गर्म गर्म भाप।
शीत लहर ऐसी
देह रही कांप
दिन में भी मुश्किल है
दिनकर के दर्शन।
कोहरे कि रातें ठंडे बदन
काँप रहे गात और काँप रहे मन।


kohare ki raaten/pradeep trivedee deep
प्रदीप त्रिवेदी दीप साहि.सम्पादक दिशेरा टाइम्स बी1 /11 क्रांतिपुरी जेलरोड रायबरेली

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