Ram Ke Vansh | राम के वंश / बाबा कल्पनेश

Ram Ke Vansh – राम के वंश / बाबा कल्पनेश

राम के वंश

विधा-श्रृंगार छंद

विधान-आदि त्रिकल-द्विकल
अंत-त्रिकल-द्विकल।दो-दो चरण समतुकांत

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करो तुम निज कुल का अब शोध।
मार्ग से हटे तभी अवरोध।।
मूल का अपने करना शोध।
तभी तो जागे निज का बोध।

राम के तुम्ही यशस्वी गान।
त्याग मत अपना यह पहचान।।
बदलना नहीं कभी भी जात।
पराये जन का है यह घात।।

चलाये रिपुजन यह अभियान।
छद्ममय रचा करें छल गान।।
तोड़ कर हिंदू-हिंदुस्तान।
प्रगति में करें अधिक व्यवधान।।

मंदिरों से मस्जिद निर्माण।
यत्न भारत का हरना प्राण।।
दिए हिंदू से मुस्लिम रूप।
सहे क्यों कल्पनेश हो चूप।।

घिनौना उनका यह दुष्कृत्य।
क्षीण करता जीवन लालित्य।।
घिनौना है यह लेकिन हाय।
समझता बोलो कब मृतप्राय।।

धरो निज पूर्वज का तुम ध्यान ।
रहोगे जुड़े तभी कल्याण।।
नहीं तो निजता को धिक्कार।
सदा यह थूँकेगा संसार।।

गया जो अपने जन से दूर।
रहा वह सदा बना मजबूर।।
झेलना मजबूरी हो साथ।
नित्य ही झुका रहेगा माथ।।

राम के वंश,कृष्ण के वंश
हंस का रूप किए अवतंश।।
हुए तुम इतने क्यों मजबूर।
भ्राँति से निज मद में हो चूर।।

करोगे निज कुल का सम्मान।
जगत यह गाएगा यश गान।।
भारती माँ के पूत महान।
धरा के अनुपम गौरव गान।।


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बाबा कल्पनेश
सारंगापुर-प्रयागराज

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