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bhaarateey saahity lekhan mein striyon kee bhoomika - HindiRachnakar

bhaarateey saahity lekhan mein striyon kee bhoomika

(bhaarateey saahity lekhan mein striyon kee bhoomika)
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महादेवी वर्मा

 

भारतीय साहित्य लेखन में स्त्रियों की भूमिका

(bhaarateey saahity lekhan mein striyon)

भारत प्राचीनकाल से ही तार्किक, आध्यात्मिक, दार्शनिक तथा बौद्धिक शिक्षा का केंद्र रहा है। विश्वपटल पर हमारा देश अपनी सभ्यता, संस्कृति, विरासत, धर्म आदि के लिए जाना जाता है तो वहीं भारत को पुरुष प्रधान देश की संज्ञा दी जाती है। स्त्री को देवी, आदिशक्ति, लक्ष्मी, माँ आदि कहा जाता है परंतु स्त्री के साथ शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, बौद्धिक शोषण किया जाता है। स्त्री को आज भी दोयम दर्जे का समझा जाता है, उसे उसके अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है। यहाँ तक कि महिलाऐं आरक्षित सीटों पर जनप्रतिनिधि चुनी जाती है तो उस महिला के मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन उसका पति या पुत्र करते हैं। उसके बाद भी स्त्रियाँ अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं हुई हैं। स्त्रियाँ लेखन के क्षेत्र में भी पीछे नहीं हैं। उन्हें कलम और कृपाण चलाना बखूबी आता है, जरूरत है सिर्फ मार्गदर्शन की। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था- 

लोगों को जगाने के लिए, 

महिलाओं को जागृत होने जरूरी है।”

    महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, मन्नू भंडारी, ऊषा प्रियम्वदा, शशि किरण शास्त्री, सूर्यबाला, नासिरा, सविस्ता चोखोबा आदि साहित्यकारों के बिन भारतीय साहित्य अधूरा है। भारतीय नारी कवयत्री, उपन्याकार, कहानीकार, नाटककार, पत्रकार, निबन्धकार आदि क्षेत्रों में लेखन द्वारा अपना परचम लहराकर समाज को नई दिशा दे रही है। उपन्याकार डॉ. सविता चोखोबा किर्त ने अपने उपन्यासमुझे चाँद चाहिए‘ में लिखा है- उपन्यास का विषय चाँद चाहने की अपेक्षा बाज़ार का विषय है। पूँजी और बाज़ार की संहिता ही दिव्या बनकर सिलबिल को वर्षा वशिष्ठ बनाती है

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    हर स्त्री के अंदर संवेदना और स्नेह का अकल्पनीय खजाना होता है। नारी अपनी अनुभूतियों, अहसासों, संवेदनाओं को कलम के माध्यम से वर्णित करती है तब उत्कृष्ट साहित्य को जन्म देती है। स्त्रियों का हृदय कोमल होता है, कमजोर नहीं। इस तथ्य को सच साबित करने के लिए अनेक असहनीय कस्ट सहन करते हुए समाज को प्रेरणा देने का कार्य करती हैं। उसे वैयक्तिक स्वतंत्रता के नाम पर छला जाता रहा है, कहीं उसके मातृव को छीना जाता है तो कहीं भ्रूणहत्या कर दी जाती है, तो कहीं बालिकाओं को उच्च शिक्षा से वंचित करके चूल्हा-चौके तक सीमित कर दिया जाता है। फिर भी आत्मबल से देश की स्वतंत्रता पश्चात अनेक महिलायें सामाजिक बन्धनों को तोड़कर भारत की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यों की मुख्यमंत्री, तीनों सेनाओं के विभिन्न पदों आदि को सुशोभित कर रही हैं। इतना ही नहीं, बछेन्द्री पाल, सुनीता विलियम्स जैसी स्त्रियाँ चंद्रमा तक अपना पैर रख चुकी हैं। इनसे आज की हर बालिका को प्रेरणा लेनी चाहिए।

    विस्तृत नभ का कोई कोना,

     मेरा कभी न अपना होना।

     परिचय का इतना इतिहास यही,

     उमड़ी कल थी, मिट आज चली।”

    नई कहानी की प्रख्यात लेखिका मन्नू भंडारी का लेखन सदैव समाज को प्रेरणा देने वाला रहा है। इनकी कहानियों में नारी जीवन की समस्याओं, नारी पात्रों के मनोभावों तथा अंतर्द्वंद्व को दर्शाया गया है। कुछ कहानियों में सामाजिक समस्याओं, मजदूर स्त्री की जीवन, बेमेल विवाह तथा स्त्री-पुरूष संबंधों को उभारा गया है। मन्नू भंडारी ने ऐसी ही कहानी ‘यही सच है’ में अंतर्द्वंद्व की भँवर में फंसी लड़की दीपा की जीवनशैली को वर्णित करते हुए लिखा है- कल्पना चाहे कितनी ही मधुर क्यों न हो, एक तृप्तियुक्त आनन्द देने वाली क्यों न हो, पर मैं जानती हूँ यह झूठ है। यदि ऐसा ही था तो कौन उसे कहने गया था कि तुम सम्बन्ध तोड़ दो।

    प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि ‘प्रकृति शक्ति है और पुरुष शक्तिमान, शक्ति के बिन शक्तिमान का कोई अस्तित्व नहीं है।’ सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, आकर्षण-विकर्षण आदि में भी नारी की प्रधानता होती है। नारी के माध्यम से युग और समाज की सारी आकांक्षाएं, सम्पूर्ण चेतनाएं, विचारधाराएं परिलक्षित होती है। नारी केंद्रित लेखन से संवेदनशीलता और ममत्व का भाव उत्पन्न होता है। प्रख्यात लेखिका नासिरा ने अपने उपन्यास ‘ठीकरे की मँगनी’ लिखा है जिसमें एक छोटी लड़की की बचपन में बिन पैसों के लेनदेन के मँगनी हो जाती है, लड़का बड़ा होने पर शादी से इंकार कर देता है। इस संकट की घड़ी में लड़की टूटती नहीं है, बल्कि एक उच्च मुक़ाम हांसिल करती है और उस लड़के के वापस लौटने पर खुद उसे दुबारा क़बूल नहीं करती है।’

    सावित्रीबाई फुले, इंदिरा गांधी, रानी लक्ष्मीबाई, झलकारीबाई, बेगम हजरत महल, मेधा पाटकर, पी0टी0 ऊषा, मधुबाला, सरोजिनी नायडू जैसी अनेक वीरांगनाओं ने सिर्फ अपने हाँथो में कलम ही नहीं उठाई है, आवश्यकता पड़ने पर तलवारें भी उठाई हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान सुप्रसिद्ध कवयत्री होने के साथ-साथ राष्ट्र की सजग प्रहरी भी हैं। सुभद्रा जी स्वाधीनता आंदोलन के समय दो बार जेल गयीं और अंग्रेजों की प्रताणनाएं सहा है फिर भी अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटीं। सुभद्रा कुमारी चौहान असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली पहली महिला थीं जिन्होंने ‘झांसी की रानी’ कविता में लिखा है

    “बुंदेले हर बोलो के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

     खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

    चमक उठी सन सत्तावन की वह तलवार पुरानी थी।”

    प्राचीनकाल से ही नारी लोक संस्कृति, रीति रिवाजों, आपसी रिश्तों, त्योहारों आदि की पोषक और संरक्षक रही है। उसी की देन है कि आज भी हम प्राचीन सभ्यताओं से बँधे हैं। लोक संस्कृति किसी क्षेत्र विशेष की नहीं, वरन भारतीय संस्कृति की पहचान है। ‘लोक’ शब्द बहुत व्यापक है जो हमारे राष्ट्र की अनेकता में एकता को चित्रित करता है। नारी शिव भी है, शक्ति भी है। वह हर क्षेत्र में पुरुषों की तरह दक्ष है। उसकी शक्ति और सहनशक्ति की बराबरी कोई भी पुरूष नहीं कर सकता है। फिर भी स्त्री को हर कदम असहजता का सामना करना पड़ता है। रूढ़िवादी सोंच के कारण आदिकाल, भक्तिकाल में महिलाओं की लेखन सामग्री बहुत कम थी, आज स्त्री स्वतंत्र है, स्वयं को सिद्धहस्त कर चुकी है और उसके साहित्यिक कृतियों को बल मिला है। स्त्रियों को सम्मान देने के लिए वर्ष 1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया गया था। वैसे तो अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मज़दूर आंदोलन की उपज है, जिसकी नींव सन 1908 में न्यूयॉर्क में पड़ गयी थी। इसका इतिहास बहुत लंबा है इसी वजह से सन 1975 से प्रतिवर्ष 8 मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है।

चित्रा मृदुगल का जीवन परिचय

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    उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में जन्मी चित्रा मृदुगल का जीवन कठिनाइयों और कांटों भरा था, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। चित्रा जी वरिष्ठ कहानीकार, उपन्याकार बनकर उभरीं। साहित्य के क्षेत्र में व्यास सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार आदि प्रदान किये गए। समाज की वास्तविकता यह है कि अंतरजातीय विवाह आज भी आसान नहीं है। ऐसे नवविवाहित जोड़े समाज मे खुलकर जीवनयापन नहीं कर सकते हैं। जमीदार परिवार में जन्मी मृदुगल जी ने पचासोत्तरी दशक में अंतरजातीय प्रेमविवाह किया था। वो अपने घर में अपमानित होने के कारण अपना घर छोड़कर चली गईं और 25 रुपये किराया देकर रहने लगीं। खुद कस्ट उठाकर गरीबों को सहारा देने के कारण मजदूर वर्ग की आँखों की पुतली बन गई थी।

    वर्तमान समय में भारतीय नारियों ने राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य और लेखन के क्षेत्र में अपना परचम लहराया है। आज नारी का योगदान कहीं कमतर नहीं आंका जा सकता है। महिलाओं ने अनेक रूढ़िवादियों, अंधविश्वासों को तोड़कर खुद चाँद तक पहुँच रही हैं। पुरुषों को भी अपनी कुंठित मानसिकता को बदलकर हर स्त्री का सम्मान करना चाहिए क्योंकि कोई भी स्त्री धन, संपत्ति और अपने अपने नाम की लालसा न रखकर, इन सबसे कहीं ज्यादा सम्मान की इच्छा रखती है।

    इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता है कि साहित्य के पृष्ठों में दर्ज स्त्री का चरित्र वेदना और कुंठा से भरा है। वह पुरुष के बराबर सम्मान पाना चाहती है परन्तु समय-समय पर इसे स्त्री होने का अहसास करा दिया जाता है। इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी नारी की स्वतंत्र पहचान नहीं है, स्वयं का नाम नहीं है, इसलिए पुरुष को स्त्री के प्रति अपनी सोंच बदलनी चाहिए और उसे खुले आकाश में उड़ने दें। स्त्री को भारत के संविधान, संसद, माननीय न्यायालयों द्वारा प्रदत्त अधिकारों को पहचानना होगा, तभी स्त्रियाँ सामाजिक, मानसिक, धार्मिक, आर्थिक राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो सकेंगी, स्त्रियों का विभिन्न क्षेत्रों में शोषण होता है, जिसका जिम्मेदार कहीं न कहीं फिल्मी जगत भी है। रुपये कमाने के लालच में फूहड़ता सभ्य समाज की बेटियों को दिग्भ्रमित कर रही है। जिसपर भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों को चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है। सब बराबर हो जाएंगे तब स्त्री-पुरुष सही मायने में एक गाड़ी के दो पहिये कहलाएंगे।

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अशोक कुमार

असिस्टेंट प्रोफेसर, कुलानुशासक, साहित्यकार

सरयू-भगवती कुंज

शिवा जी नगर (दूरभाष नगर)

रायबरेली (उप्र)

मो0 9415951459

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