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समसामयिक रचना | हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश’ | माटी वाले घर

1 . जल रही धरा,रो रहा गगन

अब ऐसा कुछ कर दो प्रभुवर,
प्रसरित हो सुख-शान्ति धरा पर।1।

अहम्-वहम् सब दोष मिटा दो,
नित जन-जन पर हो करुण-नजर।2।

जल रही धरा रो रहा गगन,
उन्मुक्त दिशा पुनि रही कहर।3।

सहज श्रृंगार से हीन धरा,
अस्तित्वप्राय गिरि,द्रोण,शिखर।4।

ढ़ह रहे भवन,जल रही छॉह,
रवि-रश्मि धुन्ध में गयी ठहर।5।

कण-कण वासी हे अविनाशी,
श्मशान बन रहा हर गॉव नगर।6।

कल का सूरज क्या कहता है,
त्रिनेत्र खोल देखो शिव शंकर।7।

हों मानव मूल्य धर्म स्थापित,
नष्ट करो बम,बारूदी-बंकर।8।

बस ‘हरीश’, की यही कामना ,
हर नयन नेह भर जाये सवॅर ।9।

नव विकास के गीत मलय संग,
गाये सरिता हर कूल लहर ।10।

2. शान्तिदूत पथ भटक गये हैं

अब तक दिन बीत गये पचपन,
असहाय तड़पता है बचपन।1।

तहस-नहस सब ठौर-ठिकाने,
कॉचों का ढ़ेर बना दरपन।2।

इस दुनियॉ से नाता कबतक,
कब तक सॉस निभाये धड़कन।3।

सिसक रही सचमुच मानवता,
काल प्रलय बन करता नर्तन ।4।

कल तक हॅसी-ठिठोली गूॅजी,
अब अट्टहास कर रहा रुदन ।5।

धरती डगमग दिशा कॉपती,
है विवश तड़पता नील गगन ।6।

देख रहे सब यहॉ तमाशा,
व्यर्थ शान्ति के सभी जतन ।7।

बम, गोले,परमाणु घूरता,
हो रही क्रूरता आज नगन ।8।

शान्ति-दूत पथ भटक गये हैं,
कुटिल चाल की ओछी अनबन ।9।

मध्यस्थ खड़ा हो जा भारत,
सुन विश्व गुरू अब तू जा बन ।10।

3 . माटी वाले घर

खपरैलों की चाल-चलन के,माटी वाले घर,
कैसे भला भुलाऊॅ बचपन,खेला है जी भर।टेक।

जेठ-दुपहरी सूरज किरणें,
तपतीं , लू बरसाती थीं,
दादी ड्योढ़ी में ही बैठी,
किस्से खूब सुनाती थीं।
आम की चटनी ,सत्तू खाते,पानी पी-पीकर,
खपरैलों की चाल-चलन के, माटी वाले घर।1।

सॉझ-सॅकारे अमराई में,
चिड़ियों के संग-संग,
कली,फूल,भौंरों से खेला,
करता था हुड़दंग।
कभी भूनकर महुआ खाता,मीठा वह सीकर,
खपरैलों की चाल-चलन के,माटी वाले घर।2।

गेहूं की दॅवरी में होती,
बैलों से दो बातें,
खलिहानों में कट जाती थीं,
तारों के संग रातें।
भूसे पर ही सो जाना वह,दूध-दही पीकर,
खपरैलों की चाल-चलन के,माटी वाले घर।3।

सावन-भादों में छप्पर से,
टप-टप चूता पानी,
कागज की हम नाव चलाते,
फिसलें राजा-रानी ।
फॉका-मस्ती कैसी होती,देखा है जीकर,
खपरैलों की चाल-चलन के,माटी वाले घर।4।

उस हाड़ कॅपाती माघ-पूस की,
शीत लहर से बचकर,
मन गदगद पुलकित हो जाता,
मॉ के ऑचल में छिपकर।
मस्ती के दिन न थी ऐसे, दिन की मुझे खबर,
खपरैलों की चाल-चलन के,माटी वाले घर।5।

कोदो,सॉवॉ,धान कुटाई,
ओखरी,जॉता,खेत जुताई,
पंड़िया-पड़वा,बछिया-बछवा,
गैया-भैंसन की चरवाई।
गुल्ली-डंडा खेल कबड्डी,छू-छू छूमन्तर,
खपरैलों की चाल-चलन के,माटी वाले घर।6।

हरिश्चन्द्र त्रिपाठी ‘हरीश’,
रायबरेली (उप्र)229010
9415955693
9125908549

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