तरकारी में महक सोंधी सी | माँ पर कविता

माँ

तरकारी में महक सोंधी सी,
माँ तुम कैसे लाती थी।
दाल बहुत मीठी लगती थी,
कैसे छौंक लगाती थी।

चूल्हा था वो लकड़ी वाला,
और बटोली पीतल की ।
रोज सबेरे धरी पलट कर,
रोज निखरती सोने सी।

बिन मक्खन की रोटी में भी,
स्वाद निराला होता था ।
सिल बट्टे पर रगड़ रगड़ कर,
पिसा मसाला होता था।

भून लिये आलू चूल्हे में,
उसमे नमक मिलाती थी।
वह तो और सुखद होता था,
माँ तुम हमें खिलाती थी।

माँ तुम अब तो चली गयी हो,
एक कहानी लगती हो।
जीवित हो मेरे जीवन में
बहुत सुहानी लगती हो।

सीधे पल्ले के आंचल में,
हम आकर छिप जाते थे।
ढप लेती मुख मेरा उसमे,
हम फिर से खिल जाते थे।

एक शिकायत लेकिन तुमसे,
करने को जी करता है।
गुन छौंके का नही सिखाई,
यह मन बहुत तरसता है।।

पुष्पा श्रीवास्तव शैली
रायबरेली उत्तर प्रदेश।

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