फिर मोचीराम | हूबनाथ

फिर मोचीराम

(प्रिय कवि धूमिल को याद करते हुए)

बाबूजी
जिनके पास शब्द थे
वे मंडी में बैठ गए

और जो अक्षरों के आगे
अंधे थे
उनकी आँखें निकाल ली गईं
और कमज़ोर डंडे में
एक मज़बूत झंडा
थमा दिया गया

बिना झंडे के
आज आदमी नंगा हो जाता है
बेसिरपैर की बात पर
दंगा हो जाता है

जिसमें आज भी
वही मारा जाता है
जिसके घर
कल की रोटी नहीं होती

ज़िंदगी इतनी भी छोटी
नहीं होती
कि सुबह काम पर गया
दस साल का बच्चा
शाम को बूढ़ा होकर लौटे

बाबूजी
आजकल तेज़ाब नहीं
सपने डालकर
आँखें फोड़ी जाती हैं

बच्चियाँ बलात्कार के बाद
ज़िंदा नहीं छोड़ी जाती हैं
क्योंकि शिनाख़्त के दौरान
जम्हूरियत का बचे रहना
ज़रूरी है

कसाई-समय में
अपनी बोटियाँ/बेटियाँ
बचाए रखने की ज़िद में
एक ख़ास रंग
मुँह पर पोते रहने की
मजबूरी है

वरना
ज़िंदगी और मौत के बीच
अब कितनी दूरी

बाबूजी सच कहूँ
पता नहीं क्यों
आजकल
बार बार यह लगता है
कि इन भूरों से तो
वे गोरे ही अच्छे थे

आख़िर
दुश्मन का चेहरा साफ़ तो था
आज़ादी सबब थी
शहादत की
ग़ुलामी शर्मिंदगी थी

गंदगी तब भी थी
कुछ दिमाग़ों में
पर उन्हें मसीहा कहने की
शर्त नहीं थी
ज़िंदगी इतनी गर्क़ नहीं थी

जैसी आज है
आधे जिस्म में कोढ़
आधे में खाज है

आज भी नर भेड़िया
एक ओर अपने छौनों के
सिर सहला रहा है
और दूसरी ओर
मासूम मेमने का
सिर चबा रहा है

गज़ब यह कि
बचे हुए मेमनों का झुंड
पूरे जोश से
तालियाँ बजा रहा है

इसीलिए आज भी
मैं इस बात पर अड़ा हूँ कि 

यदि जीने के पीछे
सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेच कर या
कुर्सियों की दलाली करके
रोज़ी कमाने में
कोई फ़र्क नही है

-हूबनाथ

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