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डॉ बृजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश का जीवन परिचय | Dr Brijendra Narayan Dwivedi Shailesh Biography in Hindi - HindiRachnakar

डॉ बृजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश का जीवन परिचय | Dr Brijendra Narayan Dwivedi Shailesh Biography in Hindi

डॉ बृजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश का जीवन परिचय  Dr Brijendra Narayan Dwivedi Shailesh Biography in Hindi

हिंदीरचनाकर में आपका स्वागत है आज हम हिंदी   साहित्य के विद्वान्  साहित्यकार डॉ. बृजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश का जीवन परिचय  जानेगे।

 

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डॉ बृजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश

डॉ बृजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश का जीवन परिचय 

विषय जानकारिया
नाम डॉ बृजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश
जन्म स्थान ग्राम पोस्ट अरंगी जनपद चंदौली उत्तर प्रदेश।
जन्मतिथि 1 जुलाई 1951
योग्यता स्नातकोत्तर समाजशास्त्र में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से। विद्यावाचस्पति महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी से ।विद्यासागर विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ भागलपुर से। साहित्य रत्न ,आयुर्वेदाचार्य, संगीत प्रभाकर प्रयागराज से
प्रकाशन कुल 8 पुस्तकें प्रकाशित –3 गीत संग्रह, दो गजल संग्रह ,एक खंडकाव्य ( सौमित्र) हिंदी संस्थान उत्तर प्रदेश से पुरस्कृत। एक मुक्त कविता संग्रह, एक विविधा ।पाषाणी तथा सुजाता की खीर खंड संग्रह शीघ्र प्रकाशित होने को है।
पिता स्वर्गीय पंडित श्रीनिवास द्विवेदी
माता श्रीमती मुनिश्वरी देवी
भाषा हिन्दी
राष्ट्रीयता हिन्दुस्तानी
विशेष रेडियो और आकाशवाणी से प्रसारित रचनाकार
सन 2017 सर्व भाषा कवि सम्मेलन में सादर रमजान शाह की कश्मीरी कविता का गीत में अनुवाद।

 

डॉ बृजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश  द्वारा रचित  गीत 

१.प्यारे प्यारे कारें बदरा


प्यारे-प्यारे कारे बदरा आओ नील गगन में।
धूप हो गई तेज, लगाती आग है तन में- मन में।।

मन मेरा व्याकुल हो जाता तपन सह नहीं पाता
जाएं कहां मिले शीतलता
इत-उत दौड़ लगाता
चैन नहीं है घर में मिलता, न मिलता आंगन में।।
प्यारे-प्यारे कारे बदरा ….
चैत गया वैशाख आ गया
जेठ है आने वाला-
पोर-पोर चुभता है तन में,
सूई-कैंची-भाला
मित्र कमी आ गई है अब क्यों तेरे अपनेपन में।।
प्यारे-प्यारे कारे बदरा….
क्या सागर का सूख गया जल या तूं है पथ भूला,
हरियाली नित है मुरझाती,
उड़ता धूल बगूला,
कैसे निकलें खुली सड़क पर दोपहरी झन झन में।।
प्यारे-प्यारे कारे बदरा…
बेचारी निमिया भी कितना साथ निभा पाएगी,
फूल झड़ रहे तारे जैसे,
पतिया कुम्हलायेगी,
क्या आएगा शव की प्यास
बुझाने तुम सावन में।।
प्यारे-प्यारे कारे बदरा…


२. बेटी नहीं मात्रकाया है 

बेटी नहीं मात्रकाया है ,
वह ममता का दृश्य रूप है।।
कठिन सर्द की ठिठुरन में वह
सुखदाई कुनकुनी धूप है।। बेटी नहीं मात्रकाया है।।*

मां के वक्षस्थल से लगकर दुख उसका वह हर लेती है झांक पिता के विवश नयन में,
सारी स्थितियां पढ़ लेती है,
अंतर्मन की पीर समझती
करुणा का पावन स्वरूप है ।।
बेटी नहीं मात्र काया है
वह ममता का दृश्य रूप है।।1

 

बप्पा मां के लिए दौड़ कर पीहर से मैं के आती है
आना जाना कठिन काम है,
फिर भी अनुपम सुख पाती है
उसे पता है प्यार बिना यह मानव जीवन अंधकूप है।।

बेटी नहीं मात्र का आया है वह ममता का दृश्य रूप है।।2

 

पूजा घर में जली धूप सी, घर आंगन महका जाती है कैसे हैं व्यतीत करना दिन माता को समझा जाती है सुन लेती दोशब्द नेह के पा जाती थाती अनूप है।।
बेटी नहीं मात्रकाया है ।।3

 

पति के मां को मां कहती है बाबा को बाबा कहती है सरस नदी की तरह कगारों बीच नित्य कलकल बहती है ,
जीवन की वह सेतु सुघर है,
कहीं नहीं कुछ भी कुरूप है।।
बेटी नहीं मात्रकाया है।।4


३. एक सजल


बोलना आसान है पर सच कथन मुश्किल बहुत
क्या कहेंगे मुझको वो घबराता मेरा दिल बहुत।।

याद क्यों कोई करे मुझसे किसी नाचीज़ को ,
हो गए दरबार में मुझ जैसे हैं दाखिल बहुत।।

अर्ज करते किस तरह मुझको नही मालूम कुछ,
उनकी महफ़िल में जो पहुँचे लोग हैं काबिल बहुत।।

उज़्र मैं कैसे करू मर्जी के मालिक आप हैं,
क्या हुआ महफिल में उनकी हो रहे शामिल बहुत।।

वो समझ पाये न पर एहसास मुझको हो रहा,
चंद हैं हमदर्द उनके शेष हैं कातिल बहुत।।

दुनिया जो कहती है वो कहती रहे उनको मगर ,
खुद को अपनी नजर में वो समझते काबिल बहुत।।

बात की तह में है क्या मालूम क्यों करते नहीं,
यूं तो उनको समझता शैलेश है आक़िल बहुत।।
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डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी शैलेश वाराणसी

 

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