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poet indresh bhadoriya poems in awadhi - HindiRachnakar
Awadhi- poetry - Gram -pradhan- chunav

poet indresh bhadoriya poems in awadhi

  poet indresh bhadoriya poems in awadhi

 

बाकी हम काम बनाय ल्याब

बसि बीस बराती लै आयो, 

बाकी हम काम बनाय ल्याब। 

 

है अबै कोरोना समय चलत,

आदेस भवा सरकारी है।

घर बाहैर के पचास जने,

चाहे नर होय या नारी है। 

 

बिटिया सयानि घर बइठि हवै,

कइसेहो का अब बर मिला भाय।

हमका तो अइसा लागत है,

कइ लीन फते हम किला भाय। 

 

अब काम हमार बनी जइसे,

वइसेन भइया निपटाय ल्याब।

बसि बीस बराती लै आयो, 

बाकी हम काम बनाय ल्याब। 

 

लेकिन लइहौ ज्यादा बरात,

तो साफ बताइत है तुमका।

सबका लै जाई पुलिस पकड़ि,

सोहदवा लगइहैं कस ठुमका। 

 

इज्जति सब मेटियामेट होई,

अखबरनौ मा सब छपि जाई।

लरिकवो कुँवारै तब लउटी,

बिटियौ कुँवारि तब रहि जाई। 

 

लेकिन हम अइसा चहित नहीं,

जस बनी तस काम बनाय ल्याब।

बसि बीस बराती लै आयो, 

बाकी हम काम बनाय ल्याब। 

 

जेतना हम तुमसे बोलेन है,

वह तौ सब द्याबै करबै।

मोटर सैकिल अलमारी फ्रिज,

वासिंग मसीन द्याबै करबै। 

 

गीजर टीवी वोवन सोवन,

थैली थोकरा करइनि का परी।

एसी कूलर सूलर पंखा,

औ डबलबेड करइनि का परी। 

 

ड्रेसिंग प्रेसिंग बरतन भँड़वा,

सासौ का बक्सा सबै द्याब।

बसि बीस बराती लै आयो, 

बाकी हम काम बनाय ल्याब। 

 

जो एतना सब द्याबै ल्याबै,

पाँन छा सौ का खवाय देइत।

लेड्डू पेंड़ा टिकिया सिकिया,

ठण्ढा सण्ढा पिलवाय देइत। 

 

गोलगप्पा सूखी रसादार,

सब्जी वब्जी बनवाय देइत।

रबड़ी हलुवा रसगुल्ला कुछ,

पूड़ी सूड़ी छनवाय देइत। 

 

अबहूँ दस बीस जउनि लइहौ,

आदर सतकारु कराय द्याब।

बसि बीस बराती लै आयो, 

बाकी हम काम बनाय ल्याब। 

 

यह तो सब अबहूँ होइ जाई,

मुलु सबै तना घाटा हमार।

लाखन रुपिया जो बांटेन है,

सबके घर मइहाँ बेउहार। 

 

वह कइसे लउटि के अब आवै,

यह बात सोचि न पाइत है।

अब आधे होइगें हैं परान,

हम सोचि सोचि पछिताइत है। 

 

चाहे अब मनई जउन कहै,

कइसेव निकारि हम भाय ल्याब।

बसि बीस बराती लै आयो, 

बाकी हम काम बनाय ल्याब। 

 

तुम मानि वानि बोलवाय लिहेव,

बाँकी सब घर भरि चलै आव।

बाजा वाले  गाड़ी वाले,

पंडित नाऊ संग लेत आव। 

 

हमका है दीन वसूलै का,

सबका येहि बरे न्योति ल्याबै।

आगे पीछे का टाइम दै,

जो दीन लीन सब लइ ल्याबै। 

 

तुमका तुम्हार सब मिलि जाई,

हिकमति तै काम चलाय ल्याब।

बसि बीस बराती लै आयो, 

बाकी हम काम बनाय ल्याब। 

2. पछिताइत है 

 

करिके बियाहु पछिताइत है। 

 

सादी के पहिले खुसी खुसी,

खुब मस्ती मउज मनाई हम।

फिर देखि सलीमा रातिउ का,

घर डेढ़ बजे तक आयी हम। 

 

मन मा आवै सो करि डारी,

कोऊ कुछ हमका कहै नहीं।

को हमसे आँखि मिलाय सकै,

अउकात कोहू कै रहै नहीं। 

 

मुलु जबते सादी भै हमारि,

ठोकर पर ठोकर खाइत है।

करिके बियाहु पछिताइत है। 

 

हम कही कि रोटी पातरि हो,

वी मोटी – मोटी दियैं बेलि।

हम कही कि खाना लै आवो,

वी थरिया आगे दियैं ठेलि। 

 

हम कही दालि तो महगी है,

यहिका थ्वारा पातरि बनाव।

वी कहैं बनउबै यही तरह,

तुम खाव चहै तनिकौ न खाव। 

 

सब धीरे – धीरे गटकि जायँ,

जेतना कमाय के लाइत है।

करिके बियाहु पछिताइत है। 

 

हम कही कि लल्लू की अम्मा,

तुम थोरी चाह बनाय दियौ।

वी कहैं बेटउना रोय रहा,

तुम यहिका दूध पियाय दियौ। 

 

हम कही कि हमरे ताब नहीं,

दफ्तर मा थकिके भयेन चूर।

वी चट्टै आँखी काढ़ि कहैं,

हमरी नजरन से हुवो दूर। 

 

नित लड़ै का फेंटु रहैं बाँधे,

जब दफ्तर ते घर आइत है।

करिके बियाहु पछिताइत है। 

 

हम कूकुर जस केतनौ भूँकी,

वी हथिनी जैसी चलैं चाल।

हम कैदी जस रिरियाइत है,

वी बनिके बइठीं कोतवाल। 

 

हम म्याघा जइसे फुथकित है,

वी साँपिनि जस बल खाती हैं।

हम बोकरी जस मिमियाइत है,

वी भेंड़हा जस गुर्राती हैं। 

 

है बीवी तुनुक मिजाज मिली,

मुलु ठकुरसोहाती गाइत है।

करिके बियाहु पछिताइत है। 

 

गरमी के मौसम मा थ्वारा,

उनका दिमाग गर्माय जात।

औ जाड़े मा उनका देखतै,

तन बदन मोर थर्राय जात। 

 

सावन जब झड़ी लगावत है,

तो बिजुरी जइस कड़कती हैं।

आलत बसन्त बउराती हैं,

पर मनई देखि फड़कती हैं। 

 

अब करम नहीं कउनौ बाँकी,

हम मागी मउत न पाइत है।

करिके बियाहु पछिताइत है।


3. खोटान खरचा 

 

नाहीं मिलतै दिहाड़ी, खोटान खरचा। 

 

जबसे यहि देस मा कोरोना है आवा।

जगह – जगह उत्पात खूब मचावा।

अबहीं जल्दी न जायी मची है चरचा।

नाहीं मिलतै दिहाड़ी, खोटान खरचा। 

 

घर मा रहौ सबसे दूरिनि ते बात करौ।

मास्क लगाय निकरौ नहीं उत्पात करौ।

भागि जाय कैसेऊ यह, बटे हैं परचा।

नाहीं मिलतै दिहाड़ी, खोटान खरचा। 

 

कउनिउ जतन करि के रोटी बनवायी।

पानी के साथ कइसेव वहिका नघायी।

साथै मा पीसि लेइत नोनु  मिरचा।

नाहीं मिलतै दिहाड़ी, खोटान खरचा। 

 

लरिका औ बच्चन का कइसे जियायी।

कहाँ का पायी जो इनका हम खवायी।

कब तक खइहैं लरिका नोनु मिरचा।

नाहीं मिलतै दिहाड़ी, खोटान खरचा। 

इन्द्रेश भदौरिया के दोहे पढ़े

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