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chhand-panchchamar | छंद-पंचचामर- बाबा कल्पनेश

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१. छंद-पंचचामर


रमानिवास जागिए,मही तुम्हें पुकारती।
प्रभात हो सके धरा,सुहाग माँग धारती।।
तुम्ही विभात प्राण हो,प्रकाश पंथ खोल दो।
विषाणु नष्ट हो सके,हवा सुमिष्टि घोल दो।।

जवान भी किसान भी,गरीब भी पुकारता।
दुखी हुआ विषाणु से,महान विश्व हारता।।
विहान गान दान दो,प्रसन्नता इसे मिले।
दृगान अश्रु खो सके,सुपंकजा उषा खिले।।

हवा बहे सुहावनी,विकास पंथ गान हो।
प्रकाश आप का जगे,कृपा यही महान हो।।
निदान हो विषाणु का,प्रवेश हो प्रभात में।
प्रसन्नता जगी रहे,हरेक प्राण-गात में।।


२.गरिमा बचे निज राष्ट्र की

भारत वही है देश अपना जो अधिक बलवान था।
योगी हुए जितवान जग के स्वर्ण का भी खान था।।
साहित्य में भी श्रेष्ठ था अति गद्य-कविता का धनी।
सद् ज्ञान का भंडार भारत दृश्यता अनुपम घनी।।

ऊँचा हिमालय सा रहा जो जन जगत के जानते।
जो विश्व का सद्गुरु रहा पर आज सब क्यों मानते।।
गत जो हजारों वर्ष बीते नित लुटेरे आ रहे।
आए मुगल अंग्रेज आए हम सहे कैसे सहे।।

यह प्रश्न सम्मुख आज सबके अति हुआ विकराल है।
आओ करें चिंतन सभी हम क्यों झुका निज भाल है।।
हम गीत गाए एकता के एक हो पाये नहीं।
निज एकता का अर्थ क्या है भाव वह लाये नहीं।।

हम स्वार्थ की निज अंधता का मोह अपनाये रहे।
अपने जनों की कर उपेक्षा नित्य मदमाये रहे।।
हम श्रेष्ठ हैं लेकिन पड़ोसी अर्थ से भी हीन है।
इसको दबाएँ बस दबाएँ क्या करेगा दीन है।।

यह त्रुटि हमें ही खा रही है पर न समझे हम इसे।
भारत पराभव भोगता तब दोष देना है किसे।।
अब हम लखें निज खंड जो अफगान- पाकिस्तान है।
लो देख बँगला देश वर्मा एकता का गान है।।

इसलाम ने बंधक बनाया हम विवश मुस्लिम बने।
यह नीति मुस्लिम राष्ट्र की इसलाम का झंडा तने।।
गोरे जनों की नीति ऐसी हों इसाई जन यहाँ।
हम स्वार्थ के अंधे न देखे हो रहा टूटन यहाँ।।

अब चेत भारत चेत अर्जुन गत महाभारत हुआ।
निज देश भारत के गगन से छँट सके गहरा धुँआ।।
अब स्वार्थ का अंधा कुआँ हम पाटकर आगे बढ़ें।
गरिमा बचे निज राष्ट्र की सोपान प्रेमिल हम चढ़ें।।


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बाबा कल्पनेश सारंगापुर-प्रयागराज

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