Click it!
Holi par kavita-Holi Kavita poem-रंग बरसा - HindiRachnakar

Holi par kavita-Holi Kavita poem-रंग बरसा

रंग बरसा

(Holi par kavita-Holi Kavita poem)


रंग बरसा मेरे आंगना में उतर
भावजो का गुलाबी सा मन हो गया।
गिर गई फिर वो दीवार जो थी खड़ी,
मेरा आंगन भी फिर से बड़ा हो गया।

गांव के फाग में रंग सातों उडे,
लाल ,पीले का ज्यादा असर हो गया।
चढ़ गया रंग बाबा की पगड़ी पे जब,
नेह मिश्रित हृदय का घड़ा हो गया।

गेहूं की बाली में रंग सोना उड़ा।
पीली सरसों में पीले की क्या बात है।
चांदनी रात में चांद ने देखा जब,
ताल में आके वह भी खड़ा हो गया।

आम में बौर का रंग खिला इस क़दर,
डालियां भी विहस फागुनी गा उठी,
साथ कोयल जो देने लगी कूक कर,
पास महुआ भी रस से भरा हो गया।

नीम पर भी चढ़ी फागुनी इस तरह,
फूल भर भर फिज़ा में उड़ाने लगी,
ढोल बजने लगे फागुनी थाप पर,
भांग का रंग थोड़ा हरा हो गया।

रह सका न मेरा मन भी काबू में अब,
गीत के गांव में लहलहाने लगा।
नयन में छंद की बज उठी बांसुरी,
प्यारे मोहन का बस आसरा हो गया।


Holi- par- kavita-Holi -Kavita- poemश्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव शैली
रायबरेली उत्तरप्रदेश।

आपको Holi par kavita-Holi Kavita poem-रंग बरसा/श्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव शैली की स्वरचित रचना कैसी लगी अपने सुझाव कमेंट बॉक्स में अवश्य बतायें।  पसंद आये तो समाजिक मंचो पर शेयर करे इससे रचनाकार का उत्साह बढ़ता है।हिंदीरचनाकर पर अपनी रचना भेजने के लिए व्हाट्सएप्प नंबर 91 94540 02444, 9621313609 संपर्क कर कर सकते है। ईमेल के द्वारा रचना भेजने के लिए  help@hindirachnakar.in सम्पर्क कर सकते है|

अन्य रचना पढ़े :

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!

You have successfully subscribed to the newsletter

There was an error while trying to send your request. Please try again.

HindiRachnakar will use the information you provide on this form to be in touch with you and to provide updates and marketing.

Subscribe to Hindi Rachnakar to get latest Post updates