Latest Poetry in Hindi | Motivational poetry | Emotional Poems

Latest Poetry in Hindi | Motivational poetry | Emotional Poems

फिर बहार आयेगी


फिर बहार आयेगी
तम की रजनी छंट जायेगी
आज मौत सहन में खड़ी है
ज़िंदगी से दो- दो हाथ लड़ पड़ी है
हिम्मत से काम लो यारों
जीवन में जूझना है प्यारों
इस कदर हार जाओगे
तो दुर्धर्ष योद्धा कैसे बन पाओगे
मानाकि विजय कोसों दूर है
लेकिन हौंसले में भी नूर है
काल को भी पथ बदलना होगा
अपने चक्र की दिशाको मोड़ना होगा
खुशियां कल अपना फूल खिलाएंगी
ज़िंदगी के चमन में फिर बहार आयेगी।।


चेहरा

टूट रहे हैं शजर सारे
उतार रहे हो नज़र हमारे
खेल रहे हो कैसा खेल
नहीं चल सकती यह अब रेल
लूट रहे हो लाशों को
फेंक रहे हो ताशों को
कितने मधुर बने हुए हो
एक कतरे रोशनी के लिए
इतने क्यों तुम तने हुए हो
अब तो जीना मुहाल है
लेकिन नहीं जाना अस्पताल है
जिसे समझे थे हम रक्षक
निकला सबसे बड़ा भक्षक
इस चेहरे से हो गयी घृणा
नहीं खेलना है अब यह क्रीड़ा
नहीं चाहिए यह अमृत मुझको
नीलकंठ बनने के लिए
बिष पीना ही सबसे अच्छा है


अभिशप्त हैं

बुरा दौर है
कि सब कुछ घट रहा है
लेकिन किसी को कुछ
नहीं खटक रहा है
प्रत्याशा में
आम आदमी ज़िंदा हैं
अच्छे दिन के साथ
अच्छी सुबह आयेगी
लोगों के नयनों में
नई रोशनी भी लायेगी
और कुछ मुझ जैसे
अभिशप्त हैं
खर आतप में
रेत की तरह तप्त हैं
प्रश्न है मेरा सीधा-सीधा
उन लाशों से
जो मेरी ही तरह हैं
जिनको अग्निदेव ने
ले लिया अपनी शरण में
और मुझे लावारिश
समझ नदियों में
कर दिया प्रवाहित
मैं बहती जा रही हूं
तैरती जा रही हूं
तैरती- तैरती
धक्के खाती-खाती
आ गई हूं
मणिकर्णिका घाट पर
जिसे कहते हैं
मोक्षदायिनी काशी
अब मुझ शिव
को कोई बताए
मेरा ठांव कहां है ?
जीते- जी तो
मुझे बहाया गया
धर्म की गंगा में
निरंतर नहलाया गया
उन व्यवस्थापकों से
धर्मवाहकों से
मज़हबी आकाओं से
पुनः पूछना चाहता हूं
कि मेरा धर्म क्या है ?
मेरा कर्म क्या है ?
कि मौत के बाद भी
नहीं मिली मुझे मुट्ठी भर जगह
जहां मुझे दफ़नाया जा सके
या
चंद लकड़ियों में मुझे
जलाया जा सके
क्या मेरा
विश्राम- स्थल यहीं है
या कुछ सफ़र और भी
अवशेष हैं ?


साहस मन का

मन का साहस
संक्रामक होता है
समझनी होगी
बड़ी शिद्दत से इस बात को
साहसी व्यक्ति का संघर्ष
कर देता है
सोयी हुई धमनियों में भी
रक्त का संचार
और पका देता है
दुर्बल मन को साहस के आंवें में
बढ़ जाती है जिससे
व्यक्ति की निडरता
और इसी बूते
जद्दोजहद करने लगता है
अपने कर्म- पथ पर
लड़ने लगता है
डटकर अपने
आंतरिक रिपुदलों से
जिन्होंने दीर्घकाल से
बना लिया है स्थायी बसेरा
रिक्त एवं निर्बल मन में
इसलिए साहस मन का
संक्रामक होता है
बचना होगा हमें
निरर्थक आक्रामकता से
क्योंकि जहां मन का साहस
पहुंचा देता है
सफलता की चोटी पर हमें
वहीं मन का दौर्बल्य
भटका देता है एक बड़े लक्ष्य से


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सम्पूर्णानंद मिश्र प्रयागराज फूलपुर 7458994874

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