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Man Ka Deepak phir jal jae- मन का दीपक फिर जल जाए

Man Ka Deepak phir jal jae- संपूर्ण सृष्टि की जलवायु में फैली महामारी से मानव जीवन संकटग्रस्त हो गया है।मनुष्य चिड़िया घरों में कैद पशु पक्षियों की भांति सीमित संसाधनों में रहने के लिए विवश हो चुका है परंतु फिर भी हौसले बुलंद हैं क्योंकि हर परिस्थिति में मनुष्य अपने आप को संभाल कर और संकटों भंवर से बाहर निकल जाता है।वैसी ही आज की स्थिति भी बनी हुई है। यह भी सत्य है जैसे पर्वतारोही अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखता है और अपने मजबूत हौसलों को हर परिस्थिति में मजबूत रखकर ऊंची सी ऊंची पर्वत श्रृंखला पर चढ़ जाता है अर्थात मनुष्य मन से तन से और बल तीनों से शक्तिशाली होता है लेकिन फिर भी मनुष्य से भी शक्तिशाली है परम सत्ता अर्थात ईश्वर, अल्लाह, गार्ड,पंचपरमेश्वर जिसकी हम सब संतान हैं।हम जानते हैं नित्य प्रत्यय हर कोई छोटे बड़े जाने-अनजाने अपराध करता रहता है जिन्हें हम जान भी नहीं पाते की मुझसे ये अपराध हो गया है परंतु हर एक पहलू का हिसाब उस परमेश्वर के पास रिकॉर्ड होता रहता है शायद प्रकृति के साथ हुए अन्याय के अपराधी संपूर्ण सृष्टि मानव जाति हैं जिसका परिणाम आज देख रहे हैं ।ऐसे में हम सिर्फ उस महाशक्ति से प्रार्थना ही कर सकते हैं। शायद हमें क्षमादान मिल जाए क्योंकि शरण में आया हुआ व्यक्ति क्षमादान का पात्र होता है इसी उम्मीद के साथ कुछ पंक्तियां निम्न वत हैं

मन का दीपक फिर जल जाए


कोई ऐसी ऊषा लाओ,
मन का दीपक फिर जल जाए।
सबका संशय स्वाहा करके,
जग में नई रोशनी लाओ।
पाप-पुण्य का लेखा-जोखा,
फिर कभी देखा जाएगा।
अभी जरूरत शीतल वायु की,
ऐसी शीतल हवा चलाओ,
जग का सारा दुःख मिट जाए।
खेतों में हरियाली आये,
हाट-बाजार फिर से रोशन हो जाए।
हे परमेश्वर!अवनि हमारी फिर सोने की चिड़िया बन जाए।
कोई ऐसी ऊषा लाओ,मन का दीपक फिर जल जाए।।


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दयाशंकर राष्ट्रपति पुरस्कृत असिस्टेंट प्रोफेसर, साहित्यकार

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